top of page

सितम

Writer: Anilesh Kumar
Anilesh Kumar
Aug 3
1 min read

निभाना तो आसान था ऐ दोस्त,


पर मोहब्बत ने मुश्किल कर दिया,


हम इबादत की तरह चाहते रहे,


वो ख़ुदा की तरह दूर हो गए...



ये हाथ थाम कर भी क्या सितम किया तुमने,


तुम्हारे इतने क़रीब तो मुझे मैं भी पसंद नहीं...



नफ़रतों का तीर ही सही, पर लरज़िश थी आवाज़ में,


बददुआ भी दी उसने, मगर डूबा रहा नमाज़ में...



हो सके तो ले जाओ उन यादों को,


अँधेरे में साये किसी काम के नहीं होते... ©

 
 
 

Recent Posts

See All
गुफ़्तगू

हो सके तो शिकायतों का सबब लिखना, हो सके तो रिवायतों का ग़ज़ब लिखना, इनायतों का करम लिखना, कुछ है दरमियाँ — ये भरम लिखना, लिखना तो ये भी कैसे लफ़्ज़ उलझ गए, लिखना तो ये भी कि ख़याल आँसुओं में बह गए लिख

 
 
 
गुनाह

मुझको समझने का गुनाह कर अगर मोहब्बत है तो बेपनाह कर मेरे ऐब ढूंढने में तो लगा है ज़माना मेरी खूबियों का तू तो हिसाब कर ये अंधेरा...

 
 
 
क़ैद

एक टूटा हुआ तारा चुपचाप जा रहा है उसे ख़बर है कि मुझे कोई ख़बर नहीं ये आँखें दीवार को छत समझती हैं तारों भरे आकाश पर मेरी नज़र नहीं ...

 
 
 

Comments


Get in Touch

©2020 by Anilesh Kumar.

bottom of page