सितम

निभाना तो आसान था ऐ दोस्त,
पर मोहब्बत ने मुश्किल कर दिया,
हम इबादत की तरह चाहते रहे,
वो ख़ुदा की तरह दूर हो गए...
ये हाथ थाम कर भी क्या सितम किया तुमने,
तुम्हारे इतने क़रीब तो मुझे मैं भी पसंद नहीं...
नफ़रतों का तीर ही सही, पर लरज़िश थी आवाज़ में,
बददुआ भी दी उसने, मगर डूबा रहा नमाज़ में...
हो सके तो ले जाओ उन यादों को,
अँधेरे में साये किसी काम के नहीं होते... ©


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