क़ैद

एक टूटा हुआ तारा चुपचाप जा रहा है
उसे ख़बर है कि मुझे कोई ख़बर नहीं
ये आँखें दीवार को छत समझती हैं
तारों भरे आकाश पर मेरी नज़र नहीं
बिजली की रोशनी है दिन भर, अब कहीं कोई पहर नहीं
नज़र एक रोज़ धूप पर पड़ी तो ख्याल आया
ऊंची इमारतों में क़ैद था मैं...


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