top of page

क़ैद

Writer: Anilesh Kumar
Anilesh Kumar
Mar 8, 2025
1 min read

एक टूटा हुआ तारा चुपचाप जा रहा है

उसे ख़बर है कि मुझे कोई ख़बर नहीं

ये आँखें दीवार को छत समझती हैं

तारों भरे आकाश पर मेरी नज़र नहीं

बिजली की रोशनी है दिन भर, अब कहीं कोई पहर नहीं

नज़र एक रोज़ धूप पर पड़ी तो ख्याल आया

ऊंची इमारतों में क़ैद था मैं...

 
 
 

Recent Posts

See All
सितम

निभाना तो आसान था ऐ दोस्त, पर मोहब्बत ने मुश्किल कर दिया, हम इबादत की तरह चाहते रहे, वो ख़ुदा की तरह दूर हो गए... ये हाथ थाम कर भी क्या सितम किया तुमने, तुम्हारे इतने क़रीब तो मुझे मैं भी पसंद नहीं...

 
 
 
गुफ़्तगू

हो सके तो शिकायतों का सबब लिखना, हो सके तो रिवायतों का ग़ज़ब लिखना, इनायतों का करम लिखना, कुछ है दरमियाँ — ये भरम लिखना, लिखना तो ये भी कैसे लफ़्ज़ उलझ गए, लिखना तो ये भी कि ख़याल आँसुओं में बह गए लिख

 
 
 
गुनाह

मुझको समझने का गुनाह कर अगर मोहब्बत है तो बेपनाह कर मेरे ऐब ढूंढने में तो लगा है ज़माना मेरी खूबियों का तू तो हिसाब कर ये अंधेरा...

 
 
 

Comments


Get in Touch

©2020 by Anilesh Kumar.

bottom of page